भारत में अंग्रेज कब आए और शासन काल की कहानी (Bharat me angrej kab aaye)

भारत में प्लासी के युद्ध के बाद मीर जफर को हटाकर अंग्रेजों ने मीर कासिम को नवाब बनाया । लेकिन उसके शासन के दौरान बंगाल में कर मुक्त निजी व्यापार करने के लिए अंग्रेज मीर कासिम के खिलाफ हो गए। जिसके लिए अंग्रेजों ने उनके विरुद्ध छेड़ दिया।

बक्सर के इस युद्ध में अंग्रेजों की जीत हुई और इसके बाद कलयु ने अवध के नवाब और मुगल बादशाह के साथ संधि कर ली इस संधि के अनुसार अवध के नवाब कंपनी को 50 लख रुपए देने के लिए सहमत हो गए और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को कंपनी वार्षिक 26 लाख की फिरौती भी देने वाली थी ।

इसके बदले में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी सत्ता कंपनी को दी जानी थी 12 अगस्त 1765 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगल बादशाह ने बंगाल की दीवानी सत्ता दी और भारत में अंग्रेजों की राजनीतिक सत्ता शुरू हो गई।

भारत में अंग्रेज कब आए

अंग्रेजों ने कंपनी के राजस्व को बढ़ाने के लिए 1772 ईस्वी में बंगाल में एक नई व्यवस्था की शुरुआत की जिसमें भू राजस्व वसूल करने के लिए इजारेदारों के साथ करार किया जाता था जो बोली लगाने पर अधिक रुपया दे उसे राजस्व 71 करने का अधिकार दिया जाता था इस व्यवस्था में इजरे दरों के लिए दस्तावेज में फार्मर शब्द का उपयोग किया जाता था .

इसलिए इस व्यवस्था को फार्मिंग व्यवस्था कहा जाता था इस व्यवस्था में इजारेदारों का एकमात्र उद्देश्य अधिक आय उत्पन्न करना था इसलिए किसानों का अवशोषण होता था जब यह प्रथा असहनी हो गई तो इसे सुधारने के लिए कार्न वालिस को भारत में गवर्नर जनरल के पद पर नियुक्त किया गया।

भारत में अंग्रेजों का “स्थाई बंदोबस्त”

कार्न वालिस गवर्नर जनरल था तब 1793 ईस्वी में भारत में अस्थाई बंदोबस्त की शुरुआत की गई जिसमें जमींदारों को जमीन और भू राजस्व का अधिकार दिया गया उन्हें सरकार के एजेंट के रूप में काम करना था जमींदार को भू राजस्व का 9 भाग सरकार को जमा करना होता था और दसवां भाग पारिश्रमिक के रूप में रखना होता था।

किस पद्धति में किसानों का शोषण होता था क्योंकि उसे जमींदार को निश्चित राजस्व देना होता था जमींदार उन पर जुल्म करते भी राजस्व वसूल करते थे जमींदार को हर वर्ष एक निश्चित राशि कर के अनुसार सरकार में जमा करने पड़ती थी फिर भी अस्थाई बंदोबस्त जमींदारों के पक्ष में था लेकिन शुरुआत में जमींदारों को थोड़ा सहन करना पड़ता था .

और तय समझौते के अनुसार राजस्व का भुगतान करना पड़ता था जो राजस्व का भुगतान नहीं कर सके उनकी जमीन जप्त कर ली जाती थी लेकिन बाद में जमींदारों ने जमीन खरीदना शुरू कर दिया सरकार को किसानों के विकास में रुचि नहीं थी इसके फल स्वरुप बंगाल में किसानों के कई विद्रोह शुरू हुई और अन्न भंडार कहा जाने वाला बंगाल हो गया।

रैयतवाड़ी व्यवस्था की शुरुआत

19वीं साड़ी की शुरुआत में 1820 ईस्वी में मुंबई और मद्रास जो कि अब चेन्नई के नाम से प्रसिद्ध है प्रति में रैयतवाड़ी व्यवस्था शुरू की गई थी इसके प्रवणता थॉमस मुनरो थे उसे समय वे मद्रास जिसका नाम चेन्नई है के गवर्नर थे ।

इस व्यवस्था में जमीन जोतने वाले किसान को जमीन का मालिक बनाया जाता था सरकार की शर्त के अनुसार किस को जमीन का भू राजस्व देना पड़ता था इस कथा से जमीन की मालिकी के अधिकार का कोई लाभ नहीं मिलता था ।

इसके कारण इस प्रकार थे की जमीन का अत्यधिक राजस्व सरकार अपनी इच्छा अनुसार भू राजस्व में वृद्धि करने का अधिकार रखती थी । किसी भी स्थिति में अनाज की पैदावार हो या ना हो तो भी किसान को भू राजस्व देना ही पड़ता था।

महालवाड़ी व्यवस्था की शुरुआत

महालवाड़ी व्यवस्था उत्तर पश्चिमी प्रांत और मध्य भारत के कुछ प्रदेशों में शुरू की गई। हाल्ट मैकेंजी नाम के अंग्रेज अधिकारी ने 1822 ईस्वी में महलवारी व्यवस्था की शुरुआत की थी ।

ब्रिटिश राजस्व दफ्तर में गांव अथवा गांव के समूह के लिए महल शब्द का प्रयोग होता था महल की इकाई गांव या गांव का भूमि समूह था इस प्रथा के अनुसार राजस्व की इकाई किस का खेत नहीं बल्कि समूचे गांव या गांव की जमीन के समूह का समावेश होता था इस पद्धति में गांव का सर्वेक्षण करके।

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